Thursday, August 20, 2026
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धैर्य का लोकगीत: डॉ. तीजन बाई और बेचैन होती युवा पीढ़ी

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत…

डॉ. अवधेश मिश्रा

यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सत्य है। दुर्भाग्य से आज का समय इस सत्य से सबसे अधिक दूर दिखाई देता है। हमारे आसपास प्रतिभाओं की कमी नहीं है, अवसरों की कमी नहीं है, संसाधनों की कमी नहीं है। कमी है तो केवल धैर्य की। आज का युवा पहले से अधिक शिक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और दुनिया से जुड़ा हुआ है, लेकिन मानसिक रूप से पहले से अधिक अधीर, विचलित और दबाव में भी है।

एक परीक्षा में असफलता, नौकरी मिलने में देरी, व्यवसाय में नुकसान, प्रेम संबंधों में टूटन या सोशल मीडिया पर अपेक्षित लोकप्रियता न मिलना—इतने भर से अनेक युवा निराशा के गर्त में चले जाते हैं। कुछ अवसाद का शिकार होते हैं, तो कुछ जीवन से ही हार मान लेते हैं। यह केवल व्यक्तिगत संकट नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ी गंभीर चुनौती है।

ऐसे समय में यदि किसी जीवन को आईना बनाकर देखा जाना चाहिए, तो वह है डॉ. तीजन बाई का जीवन।

छत्तीसगढ़ की मिट्टी में जन्मी एक साधारण बालिका, जिसने पंडवानी जैसी लोककला को अपना जीवन बनाया। लेकिन यह रास्ता फूलों से नहीं, कांटों से भरा था। उस दौर में महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर पंडवानी गाना सामाजिक परंपराओं के विरुद्ध माना जाता था। तीजन बाई ने जब मंच संभाला तो उन्हें सम्मान से पहले अपमान मिला। समाज ने विरोध किया। सामाजिक बहिष्कार हुआ। अपने ही लोगों ने उन्हें ठुकराया।

कल्पना कीजिए, जिस समाज में व्यक्ति का अस्तित्व ही सामाजिक स्वीकार्यता पर टिका हो, वहां बहिष्कार किसी भी इंसान को तोड़ सकता है। लेकिन तीजन बाई टूटी नहीं। उन्होंने यह निर्णय लिया कि वे समाज से नहीं, अपनी प्रतिभा से पहचान बनाएँगी।

यही निर्णय उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया।

उन्होंने मंच नहीं छोड़ा। रियाज़ नहीं छोड़ा। संघर्ष नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी पीड़ा को अपनी शक्ति बना लिया। धीरे-धीरे वही आवाज़, जिसे कभी दबाने की कोशिश हुई थी, दुनिया के बड़े-बड़े मंचों पर गूंजने लगी। छत्तीसगढ़ की पंडवानी गाँव की चौपाल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय सभागारों तक पहुँची। तीजन बाई ने लगभग 60 देशों में भारत की लोकसंस्कृति का परचम लहराया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले।

यह केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं थी। यह उस विश्वास की जीत थी कि यदि संकल्प अडिग हो, तो सामाजिक बहिष्कार भी सफलता की राह नहीं रोक सकता।

आज का युवा इस कहानी से क्या सीख सकता है?

सबसे पहली बात—असफलता और अस्वीकृति, जीवन का अंत नहीं होती। आज अधिकांश युवा असफलता को अपनी योग्यता का अंतिम प्रमाण मान बैठते हैं। जबकि इतिहास बताता है कि महान उपलब्धियाँ अक्सर असफलताओं की लंबी श्रृंखला के बाद ही मिलती हैं।

दूसरी बात—दूसरों की स्वीकृति से अधिक महत्वपूर्ण स्वयं पर विश्वास है। यदि तीजन बाई समाज की स्वीकृति का इंतज़ार करतीं, तो शायद वे कभी मंच तक नहीं पहुँच पातीं। उन्होंने पहले स्वयं पर विश्वास किया, दुनिया ने बाद में उन पर विश्वास किया।

तीसरी बात—धैर्य सफलता की सबसे बड़ी पूँजी है। आज की पीढ़ी ‘तुरंत परिणाम’ की संस्कृति में जी रही है। कुछ सेकंड का वीडियो वायरल होता है और हमें लगता है कि सफलता भी उतनी ही तेज़ी से मिलनी चाहिए। लेकिन कोई नहीं देखता कि उस एक क्षण के पीछे वर्षों का अभ्यास, अनुशासन और संघर्ष छिपा होता है।

युवा पीढ़ी की एक और बड़ी समस्या तुलना है। सोशल मीडिया ने दूसरों की सफलता को हमारी असफलता का पैमाना बना दिया है। हम दूसरों की उपलब्धियाँ देखते हैं, लेकिन उनका संघर्ष नहीं। हम मंज़िल देखते हैं, सफर नहीं। यही तुलना निराशा को जन्म देती है।

डॉ. तीजन बाई का जीवन इस तुलना की मानसिकता को तोड़ता है। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि दूसरे क्या कर रहे हैं। उन्होंने केवल यह तय किया कि उन्हें अपनी कला को श्रेष्ठ बनाना है। यही एकाग्रता उन्हें विश्व मंच तक ले गई।

समाज की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। हम बच्चों को अंक सिखाते हैं, लेकिन असफलता से लड़ना नहीं सिखाते। हम प्रतियोगिता सिखाते हैं, लेकिन धैर्य नहीं सिखाते। हम जीत का उत्सव मनाते हैं, लेकिन संघर्ष का सम्मान करना भूल जाते हैं। परिणाम यह होता है कि पहली ठोकर पर युवा स्वयं को असफल मान बैठता है।

विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और परिवारों में ऐसी जीवन-कथाएँ पढ़ाई जानी चाहिए, जो केवल सफलता नहीं, संघर्ष का महत्व समझाएँ। तीजन बाई जैसी विभूतियाँ इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे बताती हैं कि कठिनाइयाँ बाधा नहीं, चरित्र निर्माण का अवसर होती हैं।

भारत की सांस्कृतिक परंपरा भी यही संदेश देती है। श्रीराम ने वनवास सहा, श्रीकृष्ण ने संघर्षों के बीच धर्म की स्थापना की, और महाभारत में अर्जुन को भी विजय से पहले गहरे मानसिक द्वंद्व से गुजरना पड़ा। इतिहास और संस्कृति दोनों बताते हैं कि धैर्य के बिना कोई महान यात्रा पूरी नहीं होती।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने युवाओं से केवल यह न पूछें कि वे कितने सफल हैं, बल्कि यह भी पूछें कि वे कितने धैर्यवान हैं। क्योंकि सफलता क्षणिक हो सकती है, लेकिन धैर्य जीवन भर साथ देता है।

डॉ. तीजन बाई की कहानी हमें यह विश्वास देती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत हों, यदि व्यक्ति अपने उद्देश्य, अपने श्रम और अपने आत्मविश्वास से जुड़ा रहे, तो एक दिन वही दुनिया उसकी कहानी सुनती है। जिस महिला को कभी समाज ने स्वीकार नहीं किया, उसी महिला ने भारत की लोकसंस्कृति को दुनिया के 60 देशों तक पहुँचाया। इससे बड़ा उत्तर उन सभी लोगों के लिए क्या हो सकता है, जो मानते हैं कि विरोध और असफलता उनके सपनों का अंत है?

आज के युवाओं को सफलता के शॉर्टकट नहीं, डॉ. तीजन बाई का लंबा संघर्ष पढ़ने की ज़रूरत है। क्योंकि जीवन की सबसे ऊँची उड़ान वही भरते हैं, जो आँधियों से डरकर अपने पंख समेटते नहीं, बल्कि उन्हें और मज़बूत करना सीखते हैं।

संघर्ष आपको रोकने नहीं, गढ़ने आता है। धैर्य आपको धीमा नहीं, मजबूत बनाता है। और जो व्यक्ति अपने उद्देश्य से नहीं डिगता, अंततः वही इतिहास रचता है। डॉ. तीजन बाई जीवंत यात्रा प्रमाण हैं।

डॉ. तीजन बाई को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🙏🙏

लेखक
BSTV में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के संपादक हैं।

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