विरोध की आग: मैनपाट में बॉक्साइट खनन के खिलाफ लामबंद हुए ग्रामीण, जनसुनवाई के बाद बढ़ा तनाव
विशेष संवाददाता, अंबिकापुर/मैनपाट
5 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ के मिनी शिमला कहे जाने वाले प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मैनपाट की वादियों में इन दिनों पर्यावरण सुरक्षा और अस्तित्व की लड़ाई छिड़ गई है। मैनपाट पठार क्षेत्र में प्रस्तावित नए बॉक्साइट खनन (Bauxite Mining) ब्लॉक को लेकर हाल ही में आयोजित की गई जनसुनवाई के बाद से स्थानीय ग्रामीणों का आक्रोश सातवें आसमान पर है। कल भी स्थानीय न्यूज़ पोर्टल्स और समाचार पत्रों में यह मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। पर्यावरण की तबाही और विस्थापन के डर से दर्जनों गांवों के आदिवासी और स्थानीय निवासी पूरी तरह लामबंद हो चुके हैं।
क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा विवाद मैनपाट विकासखंड के अंतर्गत आने वाले नए क्षेत्रों में बॉक्साइट खनन के लिए लीज (पट्टा) दिए जाने और उसके लिए पर्यावरण स्वीकृति (Environmental Clearance) हासिल करने की प्रक्रिया से जुड़ा है। नियमानुसार, खनन शुरू करने से पहले प्रभावित क्षेत्र के नागरिकों की राय और आपत्तियां दर्ज करने के लिए जिला प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा जनसुनवाई (Public Hearing) का आयोजन किया गया था।
ग्रामीणों का आरोप है कि इस जनसुनवाई में उनकी वास्तविक चिंताओं को दरकिनार किया गया और कॉर्पोरेट हितों को तवज्जो दी गई। इसी के विरोध में अब मैनपाट के सुदूर अंचलों में विरोध प्रदर्शनों का दौर तेज हो गया है।
ग्रामीणों की मुख्य चिंताएं और मांगें
स्थानीय जन प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है:
- पर्यावरण की तबाही और पर्यटन को खतरा: मैनपाट अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जलप्रपातों (जैसे टाइगर पॉइंट, फिश पॉइंट) और ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि भारी मशीनरी से होने वाले बॉक्साइट उत्खनन के कारण यहां का जलस्तर (Water Table) गिर जाएगा, घने जंगल नष्ट हो जाएंगे और पर्यटन उद्योग पूरी तरह ठप हो जाएगा, जिससे हजारों लोगों की आजीविका छिन जाएगी।
- अस्तित्व और विस्थापन का डर: खनन ब्लॉक के दायरे में आने वाले गांवों के आदिवासियों को अपनी पुश्तैनी जमीन, खेती और संस्कृति के छिन जाने का डर है। ग्रामीणों का साफ कहना है, “हम जान दे देंगे, लेकिन अपनी उपजाऊ जमीन और पुरखों के जंगल को उजड़ने नहीं देंगे।”
- प्रदूषण और स्वास्थ्य का संकट: पूर्व में मैनपाट के कुछ हिस्सों में हुई बॉक्साइट माइनिंग का उदाहरण देते हुए स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा कि खनन से उड़ने वाली लाल धूल (बॉक्साइट डस्ट) के कारण आसपास के गांवों में सांस की बीमारियां और फसलों को भारी नुकसान पहुंच रहा है। नए ब्लॉक से यह संकट और गहरा जाएगा।
जनसुनवाई के बाद रणनीति में बदलाव: ‘ग्राम सभा’ को बनाया हथियार
प्रशासनिक स्तर पर जनसुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब आंदोलनकारियों ने कानूनी और संवैधानिक रास्तों का रुख किया है। पेसा कानून (PESA Act) के तहत आदिवासियों को मिले अधिकारों का हवाला देते हुए प्रभावित गांवों में विशेष ग्राम सभाएं बुलाने की तैयारी की जा रही है। ग्रामीणों की रणनीति है कि ग्राम सभा के माध्यम से खनन के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर सीधे राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भेजा जाए, ताकि इस परियोजना को निरस्त कराया जा सके।
प्रशासन और कंपनी का पक्ष
दूसरी ओर, खनन कंपनी और प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि इस परियोजना से क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और जिला खनिज संस्थान न्यास (DMFT) फंड के माध्यम से मैनपाट के बुनियादी ढांचे (सड़क, अस्पताल और स्कूल) का तेजी से विकास किया जा सकेगा। प्रशासन का दावा है कि पर्यावरण नियमों का पूरी तरह पालन किया जाएगा और प्रभावितों को उचित मुआवजा व पुनर्वास पैकेज दिया जाएगा।
आगामी दिनों में बढ़ सकता है टकराव
स्थानीय संगठनों और ‘मैनपाट बचाओ संघर्ष समिति’ ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने ग्रामीणों की जनभावनाओं का सम्मान करते हुए इस बॉक्साइट खनन परियोजना को वापस नहीं लिया, तो अंबिकापुर जिला मुख्यालय में एक बड़ा चक्काजाम और उग्र आंदोलन किया जाएगा। फिलहाल, मैनपाट के इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक बहस छिड़ी हुई है और आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ सकता है।

