छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर अनूठी पहचान दिलाने वाली लोक संस्कृति के एक युग का अंत: प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन
विशेष संवाददाता, रायपुर
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कला ‘पंडवानी’ को वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाली महान कलाकार डॉ. तीजन बाई का आज सुबह रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में निधन हो गया। वह लगभग 70 वर्ष की थीं और पिछले कुछ समय से लकवे (पैरालिसिस) तथा फेफड़ों व किडनी के गंभीर संक्रमण से जूझ रही थीं। उनके निधन की खबर से पूरे देश सहित विशेषकर कला और संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
गनियारी गांव से वैश्विक मंच तक का सफर
1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने बेहद साधारण और संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि से उठकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उन्होंने पंडवानी की ‘कपालिक शैली’ को चुना, जिसमें कलाकार खड़े होकर, हाथ में तंबूरा लेकर बेहद ओजस्वी ढंग से अभिनय और गायन के जरिए महाभारत की कथा सुनाता है। उनके प्रदर्शन की इस खास शैली, बुलंद आवाज और चेहरे के जीवंत भावों ने दुनिया भर के दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने ब्रिटेन, फ्रांस, मॉरीशस और जर्मनी सहित करीब 17 से अधिक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया।
देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजी गईं
कला के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के तीनों प्रमुख पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया था:
- पद्म श्री (1988)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
- पद्म भूषण (2003)
- पद्म विभूषण (2019)
राजनीतिक व कला जगत ने जताया गहरा शोक
तीजन बाई के निधन पर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री समेत कई गणमान्य हस्तियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। शोक संदेशों में कहा गया है कि तीजन बाई का जाना भारतीय लोक संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने न केवल एक विधा को जीवित रखा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए लोक कला का एक समृद्ध मार्ग तैयार किया।
उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा, जहां देश-विदेश से उनके प्रशंसक और कलाकार उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंच रहे हैं।

